फ़ासले

एक इशारा तो दो
कि उम्मीद जगे बाकी के इंतज़ार के लिए.
बातें कर के दिल नहीं भरता अब
कि बातें करने वालों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है.
हम तो फ़ेसबुक, मेस्सेंजर, वॉट’स ऐप से आगे जा पहुँचे हैं
और एक तुम हो
जो अभी भी हमें sms से खुश करना चाहती हो.
काश तुम्हारे भी थोड़े बाल सफेद होते
और तुम्हें भी जल्दी होती मेरी तरह
फ़ासले तय करने की.

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परिचय – रामधारी सिंह दिनकर

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं
बँधा हूँ, स्वपन हूँ, लघु वृत हूँ मैं
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

समाना चाहता है, जो बीन उर में
विकल उस शुन्य की झनंकार हूँ मैं
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं

जिसे निशि खोजती तारे जलाकर
उसीका कर रहा अभिसार हूँ मैं
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं

कली की पंखडीं पर ओस-कण में
रंगीले स्वपन का संसार हूँ मैं
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं

मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं
रुंदन अनमोल धन कवि का, इसी से
पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी
समा जिस्में चुका सौ बार हूँ मैं

न देंखे विश्व, पर मुझको घृणा से
मनुज हूँ, सृष्टि का श्रृंगार हूँ मैं
पुजारिन, धुलि से मुझको उठा ले
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं

सुनुँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा
स्वयं युग-धर्म की हुँकार हूँ मैं
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं

दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं
सजग संसार, तू निज को सम्हाले
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं

बंधा तुफान हूँ, चलना मना है
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं
कहूँ क्या कौन हूँ, क्या आग मेरी
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं ।।

तुम

अनजान से एक पल में
तुम याद आयी
और याद आए कुछ पल|
कई चेहरे
कुछ नये कुछ पुराने
कई यादें
कुछ खट्टी कुछ मीठी|
सोचा कुछ सवाल करूँ
कुछ खुद से
कुछ तुम से
फिर सोचा
ये सिलसिला भी अच्छा है
न किसी की नज़र में गिरने का ख़ौफ़
न किसी के दिल में उतरने की ख्वाहिश|

लब-ए-खामोश

रात को िदन में घुलते देखा है
चाँद में बैठी सूत कातती इक बुिढया को देखा है
ख़ुदा कैसा िदखता है मुझे नहीं मालूम
पर अक्सर
अपने नाम को तुम्हारे होठों से िनकलते देखा है…….

आओ िमल कर बैठें

कई िदनों से ख्वािहश थी
ईक पूरा िदन तुम्हारे साथ िबताने की।

ळम्हे जो इधर-उधर खर्च िकये थे मैंने
उन सबको बटोरने की।
तुम्हारी यादों के टूकड़े
फ़ैले हैं जो सारे घर में
अक्सर पाँव में चुभते हैं
उन टूकड़ों को तुम्हारे साथ िमल कर
जोड़ने की।

कभी इधर आओ
तो साथ िमल बैठें
पुरानी यादें ताजा करें
और चंद नयी यादों का तोहफ़ा
हम दोनों अपने घर ले जायें।।

बड़-बड़

मान मौसम का कहा
छाई घटा
जाम उठा……
बहुत टेम्पटिंग लाईन्स हैं……. ऐसा लगता है कि अगर आप इस गाने को सुन रहे हैं और आपके हाथ में एक ग्लास नहीं है तो आप कोई गुनाह कर रहे हैं – जैसे मैं अभी कर रहा हूँ…..

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला…….
नहीं मैं सेन्टी नहीं हो रहा हूँ…… ये जग्गु दादा गा रहे हैं
 बीच में एक पूराना यार मिल गया….. औनलाईन था….. थोडा खोज खबर ले लिये……
अब तो बाद में ही हो पायेगी ब्लौग्बाजी!

जाते-२ ग़ालिब को दोहराये जाता हूँ –

“मोहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़ीर पे दम निकले”